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हिन्दू धर्म में माथे पर तिलक क्यों लगाया जाता है ?#बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष श्रीमती #वनिता_कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थानसनातन #हिन्दू धर्म में तिलक धारण (लगाने) की परम्परा उतनी ही प्राचीन है जितने कि स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण । शास्त्रों में जब भी भगवान श्रीमन्नारायण या श्रीकृष्ण का वर्णन मिलता है तो उनके ललाट पर कस्तूरी का तिलक अवश्य होता है—कस्तूरी तिलकं ललाट पटले वक्ष:स्थले कौस्तुभं,नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणु: करे कंकणम्।हिन्दू धर्म में ब्रह्मा, विष्णु, महेश और शक्ति—इन प्रमुख देवताओं के आधार पर मुख्य रूप से चार प्रकार के तिलक धारण करने का विधान है । शिवजी के उपासक भस्म से त्रिपुण्ड्र, विष्णु भक्त सुगन्धित द्रव्यों या पवित्र मिट्टी से त्रिशूल की आकृति वाला ऊर्ध्वपुण्ड्र और ब्रह्मा के भक्त एक सीधी रेखा का तिलक लगाते हैं । जो केवल भगवती के उपासक (शाक्त) हैं, वे कुमकुम या सिन्दूर की लाल बिन्दी (बिन्दु) का तिलक धारण करते हैं ।हिन्दू धर्म में माथे पर तिलक क्यों लगाया जाता है ?जब हमारे आराध्य, चाहें वह भगवान विष्णु हों या श्रीकृष्ण, श्रीराम हों या सदाशिव, सभी तिलकधारी हैं, तो आराधक कैसे बगैर तिलक के रह सकता है ? वैष्णव खड़े तिलक (ऊर्ध्वपुण्ड्र) की दो समानान्तर रेखाओं को श्रीमन्नारायण के दोनों चरणकमल मानते हैं। उनका विश्वास है कि मस्तक पर तिलक रूपी चरणकमल धारण करने से मृत्यु के बाद उन्हें ऊर्ध्वगति (विष्णुलोक) की प्राप्ति होगी ।शक्ति के उपासकों का बिन्दी लगाने के पीछे यह तर्क है कि शून्य (बिन्दी) से ही सृष्टि का उद्गम और विलय होता है । किसी अंक के साथ शून्य (जीरो) जोड़ देने से उस संख्या का महत्व बहुत बढ़ जाता है। जैसे १० के आगे तीन जीरो लगा दिए जाएं तो वह १०,००० हो जाता है । उसी प्रकार मस्तक पर धारण की गयी बिन्दी मनुष्य की तेजस्विता में वृद्धि कर उसके जीवन को ऊपर की ओर अर्थात् मोक्षगामी बना देती है।पूजा, भजन, ध्यान आदि में मन की शान्ति बहुत जरुरी है । अत: मन को शान्त और सात्विक रखने के लिए माथे पर चन्दन, कपूर, केसर आदि का लेप स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा माना गया है । ब्रह्मवैवर्तपुराण में कहा गया है—बिना तिलक लगाये किया गया कोई भी धार्मिक कार्य (स्नान, दान, तप, होम, पितृ कर्म, संध्या आदि) सफल नहीं होता है—स्नानं दानं तपो होमं दैवं च पितृ कर्मसु ।तत्सर्वं निष्फलं याति ललाटे तिलकं विना ।।बिना बिन्दी या तिलक का सूना माथा अपशकुन का प्रतीक माना जाता है । शास्त्रों में तो यहां तक माना गया है कि यात्रा पर या किसी विशेष कार्य पर जाते समय यदि कोई खाली मस्तक व्यक्ति सामने से आ जाए तो वह अपशकुन होता है । इसीलिए यात्रा पर जाते समय और किसी विशेष कार्य के लिए जाते समय तिलक धारण करना शुभ माना जाता है।तिलक लगाने के लाभ!!!!!!शास्त्रों में #तिलक नाभि से नीचे के अंगों को छोड़कर मस्तक, ग्रीवा, भुजा, बाहुमूल, हृदय व उदर आदि पर लगाये जाने का विधान है । दोनों भौंहों के मध्य तिलक लगाने के स्थान पर सुषुम्ना नाड़ी रहती है । अत: यह स्थान अनन्त शक्ति व ओज का केन्द्र माना गया है । इसी स्थान पर दिव्य तृतीय नेत्र होता है । योग साधना में ध्यान इसी स्थान पर लगाया जाता है । इस स्थान पर पित्त को सीमा से अधिक न बढ़ने देने व सुषुम्ना नाड़ी को सक्रिय रखने के लिए तिलक लगाने का विधान है ।कठोपनिषद् के अनुसार सुषुम्ना नाड़ी मस्तक के सामने से निकलती है । इस स्थान पर तिलक धारण करने से मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है।शरीर की पांचों ज्ञानेन्द्रियों (कान, नेत्र, जिह्वा, नाक और त्वचा) के करोड़ों रोमकूप ललाट के इसी स्थान पर रहते हैं जहां पुरुष तिलक और स्त्रियां बिन्दी लगाती हैं । यदि तिलक व बिन्दी को सही स्थान पर लगाया जाए तो शरीर के किसी भी द्वार से अशुभ और अनिष्ट मनुष्य के अंत:करण में उसी प्रकार प्रवेश नहीं कर पाते जैसे घर के प्रवेश द्वार पर स्थापित गणपति के नीचे से कोई अमंगल घर में प्रवेश नहीं कर पाता है।सौभाग्यवती स्त्रियों को कुमकुम व सिन्दूर का ही तिलक करना चाहिए । सिन्दूर में सर्वदोषनाशक शक्ति होती है । सिन्दूर में पारद और कुमकुम में हल्दी—ये दोनों ही रंजक पित्त को नियन्त्रित कर सुषुम्ना नाड़ी को सक्रिय और स्वस्थ रखते हैं ।तिलक लगाने से भाग्य चमकता है और दुर्भाग्य दूर होता है ।चन्दन, केसर, कस्तूरी का तिलक लगाना आंखों के लिए लाभप्रद है ।तिलक लगाना कान्ति व आयु को बढ़ाने वाला है । इसीलिए रक्षाबंधन और भाईदूज पर बहनें भाइयों की लम्बी आयु के लिए उनके माथे पर तिलक करती हैं ।तिलक किस वस्तु से लगाएं ?खड़ा तिलक (ऊर्ध्वपुण्ड्र)—खड़िया मिट्टी, गोपी चन्दन, केसर, चन्दन, कुमकुम, भस्म, और पवित्र मिट्टी (पर्वत की चोटी, पवित्र नदियों और समुद्र के तट, बांबी और तुलसी के वृक्ष की जड़ की मिट्टी) और जल से लगाया जा सकता है ।पड़ा या लेटा हुआ तिलक (त्रिपुण्ड्र)—यज्ञ की भस्म से लगाया जाता है ।चन्दन से दोनों प्रकार का तिलक लगाया जा सकता है । विशेष उत्सवों व शुभ कर्म के दौरान चन्दन का तिलक लगाना चाहिए । केवल अपने तिलक लगाने के लिए चन्दन न घिसें, पहले अपने आराध्य को अर्पण करने के बाद बचे हुए चंदन का तिलक स्वयं लगाना चाहिए ।मिट्टी से तिलक का महत्व!!!!!!मिट्टी और भस्म दुर्गन्ध और कीटाणुओं का नाश करते हैं इसलिए इनसे भी तिलक लगाने का विधान है । श्यामवर्ण की मिट्टी शान्तिदायिनी, रक्तवर्ण की मिट्टी वश में करने वाली, पीली मिट्टी लक्ष्मी देने वाली और सफेद मिट्टी धर्म में लगाने वाली होती है ।ऋतु के अनुसार द्रव्यों से तिलक!!!!!शास्त्रों में ऋतु के अनुसार भी तिलक लगाने की बात कही गयी है । सर्दी में केसर, कस्तूरी, गोरोचन आदि गर्म चीजों का तिलक लगाना चाहिए जिससे माथे पर पित्त सक्रिय बना रहे । गर्मी में कर्पूर मिला चन्दन का तिलक लगाने से सिरदर्द, रक्तचाप, आंखों में जलन आदि से बचाव होता है ।यदि किसी के पास तिलक के लिए ऊपर जो द्रव्य बताये गये हैं, वे नहीं हैं तो केवल शुद्ध जल से भी तिलक करने का विधान है ।#Vnita🙏🙏❤️तिलक कैसे लगाएं ?त्रिपुण्ड्र बायें नेत्र से दायें नेत्र तक ही लम्बा होना चाहिए । त्रिपुण्ड्र की रेखाएं बहुत लम्बी होने पर तप को और छोटी होने पर आयु को कम करती हैं ।उर्ध्वपुण्ड्र भौंहों के मध्य में ढाई अंगुल की लम्बाई का होना चाहिए ।भस्म मध्याह्न से पहले जल मिला कर, मध्याह्न में चंदन मिलाकर और सायंकाल सूखी भस्म ही त्रिपुण्ड्र रूप में लगानी चाहिए।

हिन्दू धर्म में माथे पर तिलक क्यों लगाया जाता है ?

#बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष श्रीमती #वनिता_कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान

सनातन #हिन्दू धर्म में तिलक धारण (लगाने) की परम्परा उतनी ही प्राचीन है जितने कि स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण । शास्त्रों में जब भी भगवान श्रीमन्नारायण या श्रीकृष्ण का वर्णन मिलता है तो उनके ललाट पर कस्तूरी का तिलक अवश्य होता है—

कस्तूरी तिलकं ललाट पटले वक्ष:स्थले कौस्तुभं,
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणु: करे कंकणम्।

हिन्दू धर्म में ब्रह्मा, विष्णु, महेश और शक्ति—इन प्रमुख देवताओं के आधार पर मुख्य रूप से चार प्रकार के तिलक धारण करने का विधान है । शिवजी के उपासक भस्म से त्रिपुण्ड्र, विष्णु भक्त सुगन्धित द्रव्यों या पवित्र मिट्टी से त्रिशूल की आकृति वाला ऊर्ध्वपुण्ड्र और ब्रह्मा के भक्त एक सीधी रेखा का तिलक लगाते हैं । जो केवल भगवती के उपासक (शाक्त) हैं, वे कुमकुम या सिन्दूर की लाल बिन्दी (बिन्दु) का तिलक धारण करते हैं ।

हिन्दू धर्म में माथे पर तिलक क्यों लगाया जाता है ?

जब हमारे आराध्य, चाहें वह भगवान विष्णु हों या श्रीकृष्ण, श्रीराम हों या सदाशिव, सभी तिलकधारी हैं, तो आराधक कैसे बगैर तिलक के रह सकता है ? वैष्णव खड़े तिलक (ऊर्ध्वपुण्ड्र) की दो समानान्तर रेखाओं को श्रीमन्नारायण के दोनों चरणकमल मानते हैं।

 उनका विश्वास है कि मस्तक पर तिलक रूपी चरणकमल धारण करने से मृत्यु के बाद उन्हें ऊर्ध्वगति (विष्णुलोक) की प्राप्ति होगी ।
शक्ति के उपासकों का बिन्दी लगाने के पीछे यह तर्क है कि शून्य (बिन्दी) से ही सृष्टि का उद्गम और विलय होता है । किसी अंक के साथ शून्य (जीरो) जोड़ देने से उस संख्या का महत्व बहुत बढ़ जाता है। 

जैसे १० के आगे तीन जीरो लगा दिए जाएं तो वह १०,००० हो जाता है । उसी प्रकार मस्तक पर धारण की गयी बिन्दी मनुष्य की तेजस्विता में वृद्धि कर उसके जीवन को ऊपर की ओर अर्थात् मोक्षगामी बना देती है।

पूजा, भजन, ध्यान आदि में मन की शान्ति बहुत जरुरी है । अत: मन को शान्त और सात्विक रखने के लिए माथे पर चन्दन, कपूर, केसर आदि का लेप स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा माना गया है । ब्रह्मवैवर्तपुराण में कहा गया है—बिना तिलक लगाये किया गया कोई भी धार्मिक कार्य (स्नान, दान, तप, होम, पितृ कर्म, संध्या आदि) सफल नहीं होता है—

स्नानं दानं तपो होमं दैवं च पितृ कर्मसु ।
तत्सर्वं निष्फलं याति ललाटे तिलकं विना ।।

बिना बिन्दी या तिलक का सूना माथा अपशकुन का प्रतीक माना जाता है । शास्त्रों में तो यहां तक माना गया है कि यात्रा पर या किसी विशेष कार्य पर जाते समय यदि कोई खाली मस्तक व्यक्ति सामने से आ जाए तो वह अपशकुन होता है । इसीलिए यात्रा पर जाते समय और किसी विशेष कार्य के लिए जाते समय तिलक धारण करना शुभ माना जाता है।

तिलक लगाने के लाभ!!!!!!

शास्त्रों में #तिलक नाभि से नीचे के अंगों को छोड़कर मस्तक, ग्रीवा, भुजा, बाहुमूल, हृदय व उदर आदि पर लगाये जाने का विधान है । दोनों भौंहों के मध्य तिलक लगाने के स्थान पर सुषुम्ना नाड़ी रहती है । अत: यह स्थान अनन्त शक्ति व ओज का केन्द्र माना गया है । इसी स्थान पर दिव्य तृतीय नेत्र होता है । योग साधना में ध्यान इसी स्थान पर लगाया जाता है । इस स्थान पर पित्त को सीमा से अधिक न बढ़ने देने व सुषुम्ना नाड़ी को सक्रिय रखने के लिए तिलक लगाने का विधान है ।

कठोपनिषद् के अनुसार सुषुम्ना नाड़ी मस्तक के सामने से निकलती है । इस स्थान पर तिलक धारण करने से मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है।

शरीर की पांचों ज्ञानेन्द्रियों (कान, नेत्र, जिह्वा, नाक और त्वचा) के करोड़ों रोमकूप ललाट के इसी स्थान पर रहते हैं जहां पुरुष तिलक और स्त्रियां बिन्दी लगाती हैं । यदि तिलक व बिन्दी को सही स्थान पर लगाया जाए तो शरीर के किसी भी द्वार से अशुभ और अनिष्ट मनुष्य के अंत:करण में उसी प्रकार प्रवेश नहीं कर पाते जैसे घर के प्रवेश द्वार पर स्थापित गणपति के नीचे से कोई अमंगल घर में प्रवेश नहीं कर पाता है।

सौभाग्यवती स्त्रियों को कुमकुम व सिन्दूर का ही तिलक करना चाहिए । सिन्दूर में सर्वदोषनाशक शक्ति होती है । सिन्दूर में पारद और कुमकुम में हल्दी—ये दोनों ही रंजक पित्त को नियन्त्रित कर सुषुम्ना नाड़ी को सक्रिय और स्वस्थ रखते हैं ।

तिलक लगाने से भाग्य चमकता है और दुर्भाग्य दूर होता है ।

चन्दन, केसर, कस्तूरी का तिलक लगाना आंखों के लिए लाभप्रद है ।

तिलक लगाना कान्ति व आयु को बढ़ाने वाला है । इसीलिए रक्षाबंधन और भाईदूज पर बहनें भाइयों की लम्बी आयु के लिए उनके माथे पर तिलक करती हैं ।

तिलक किस वस्तु से लगाएं ?

खड़ा तिलक (ऊर्ध्वपुण्ड्र)—खड़िया मिट्टी, गोपी चन्दन, केसर, चन्दन, कुमकुम, भस्म, और पवित्र मिट्टी (पर्वत की चोटी, पवित्र नदियों और समुद्र के तट, बांबी और तुलसी के वृक्ष की जड़ की मिट्टी) और जल से लगाया जा सकता है ।

पड़ा या लेटा हुआ तिलक (त्रिपुण्ड्र)—यज्ञ की भस्म से लगाया जाता है ।

चन्दन से दोनों प्रकार का तिलक लगाया जा सकता है । विशेष उत्सवों व शुभ कर्म के दौरान चन्दन का तिलक लगाना चाहिए । केवल अपने तिलक लगाने के लिए चन्दन न घिसें, पहले अपने आराध्य को अर्पण करने के बाद बचे हुए चंदन का तिलक स्वयं लगाना चाहिए ।

मिट्टी से तिलक का महत्व!!!!!!

मिट्टी और भस्म दुर्गन्ध और कीटाणुओं का नाश करते हैं इसलिए इनसे भी तिलक लगाने का विधान है । श्यामवर्ण की मिट्टी शान्तिदायिनी, रक्तवर्ण की मिट्टी वश में करने वाली, पीली मिट्टी लक्ष्मी देने वाली और सफेद मिट्टी धर्म में लगाने वाली होती है ।

ऋतु के अनुसार द्रव्यों से तिलक!!!!!

शास्त्रों में ऋतु के अनुसार भी तिलक लगाने की बात कही गयी है । सर्दी में केसर, कस्तूरी, गोरोचन आदि गर्म चीजों का तिलक लगाना चाहिए जिससे माथे पर पित्त सक्रिय बना रहे । गर्मी में कर्पूर मिला चन्दन का तिलक लगाने से सिरदर्द, रक्तचाप, आंखों में जलन आदि से बचाव होता है ।

यदि किसी के पास तिलक के लिए ऊपर जो द्रव्य बताये गये हैं, वे नहीं हैं तो केवल शुद्ध जल से भी तिलक करने का विधान है ।
#Vnita🙏🙏❤️
तिलक कैसे लगाएं ?

त्रिपुण्ड्र बायें नेत्र से दायें नेत्र तक ही लम्बा होना चाहिए । त्रिपुण्ड्र की रेखाएं बहुत लम्बी होने पर तप को और छोटी होने पर आयु को कम करती हैं ।

उर्ध्वपुण्ड्र भौंहों के मध्य में ढाई अंगुल की लम्बाई का होना चाहिए ।
भस्म मध्याह्न से पहले जल मिला कर, मध्याह्न में चंदन मिलाकर और सायंकाल सूखी भस्म ही त्रिपुण्ड्र रूप में लगानी चाहिए।

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श्री हनुमान चालीसा कितनी बार पढ़ना चाहिए? बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम की अध्यक्ष श्रीमती वनिता कासनियां पंजाब १. हनुमान चालीसा का 100 बार जप करने पर आपको सभी भौतिकवादी चीजों से मुक्ति मिल जाती है २.हनुमान चालीसा का 21 बार जाप करने से धन में वृद्धि होती है। ३. हनुमान चालीसा का 19 बार जाप करने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है। ४.हनुमान चालीसा का 7 बार जाप करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। ५.हनुमान चालीसा का 1 बार जप करने से भगवान हनुमान जी का आशीर्वाद मिलता है और आपको हर स्थिति में विजयी होने में मदद मिलती है। ६.अगर आप अपने जीवन में एक साथ कई परेशानियों से परेशान है और हनुमान जी की विशेष कृपा पाना चाहते है तो सुबह के 4 बजे 7 बार हनुमान चालीसा का पाठ करे ७.मंगलवार और शनिवार को हनुमान चालीसा का 1 बार जप करने से हनुमान जी का आशीर्वाद मिलता है और मंगल दोष, साढ़े साती जैसे हर दोष का निवारण होता है। ८.भगवान हनुमान जी का नाम जप करने से आपके आसपास एक सकारात्मक आभा का निर्माण होता है। ९.राम नाम का जप या राम हनुमान का कोई भी राम भजन, हनुमान जी को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है क्योंकि वे भगवान श्री राम...

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